बड़ा ही मासूम सा दिल था मेरा,
मोहब्बत के नाम पर टुकड़ों में बाँट दिया गया।
उठना भी सीखा, गिरना भी सीखा,
हर मोड़ पर दर्द का सबक मिल गया।
क्यों ज़रूरी थी ये कसक, ये तन्हाई,
आज तक इस सवाल का जवाब ना मिला।
नाज़ुक सा था मेरा मन,
मगर यक़ीं की सलाख़ों तले रौंद दिया गया।
कोमल सा था मेरा तन,
मगर समाज की अदालत में तार-तार कर दिया गया।
फिर भी मुस्कुराना सीखा मैंने,
ज़ख़्मों को पर्दे के पीछे छुपाना सीखा मैंने।
क्योंकि शायद यही रिवाज़ है इस दुनिया का,
टूटकर भी जीना… और बिखरकर भी संभल जाना।
Day Dreamer©®