प्रेमचंद्र--
क़्या दौर था माँ
भारती का आंचल
जैसे कचरे का चीथड़ा!!
मातृभूमि कि वेदना
कराह सुनता कौन युग
काल समय जन जीव
जानवर थे सब मौन!!
गांव गरीब किसान
मजदूर का पी रहा था
सत्ता सामंत खून!!
व्यथा व्यथित घायल
वेदनासे व्यथित भारत
का जन जन मूक मौन!!
गुलामी का दंश था न
कम सामाजिक रस्मो
रिवाज़ धर्म कर्म मर्म
मर्यादा थी खंड खंड!!
निःशब्द माँ भारती के
सजल नेत्र गए सुख!!
शिव त्रिशूल पर बसी काशी
जागी!!
लम्हो लम्हो कि लालसा
माँ भारती जागी कचरे
चीथड़े आंचल प्रकाश
धनपत राय सपूत लमही
काशी अभिमान!!
शिव त्रिशूल पर बसी
काशी जागी दमड डमड
डमड निनाद कण कण
काशी का हुंकार गूंज!!
लम्हो लम्हो कि लालसा
माँ भारती जागी कचरे
चीथड़े आंचल प्रकाश
उजियार आया!!
लमही पावन भूमि धनपत
राय आवाहन अस्तित्व पाया!!
गुलाम देश समाज राष्ट्र कि
दिन दशा कि दृष्टि दिशा देने
धनंपत राय प्रेम प्रेरणा चंद्र
शीतल प्रकाश आया!!
कलम का सिपाही कर्म
कलम का योद्धा जन जन
आकांक्षा उद्देश्य का उद्धभव
चंद्र प्रेम युग चेतना जगा!!
ना तीर ना तलवार ना
लहू का एक कतरा बहा
शांति सौम्य कलम कि
ताकत ने झकझोर दिया!!
गुलाम मुल्क कि सवेदना
जागृत कर सामाजिक
चेतना अव्यक्त वेदना
कर्म क्रांति कि सवेदना!!
कथा उपन्यास लघु कथा
शस्त्र कलम कि धार तेज
तलवार धनपत राय
प्रेम चंद्र सत्यार्थ कल्पना!!
नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश!!