आज का युवा--
आज युवा विश्व का स्वयं दिग्भ्रमित, भौतिकता की चकाचौंध में भटक गया है।
भूल गया है युवा चेतना की मर्यादा, जिम्मेदारी, लालच, तृष्णा, मृगमरीचिका दौड़ता
भाग रहा है।
रातों-रात सब कुछ, दुनिया, दौलत, शोहरत, इज्जत हासिल करने की खातिर,मर्यादाओं का नित उल्लंघन कर रहा है।
कभी फंस जाता नशे के जाल में, शराब, कबाब, शबाब की दुनिया में,स्वयं को जलाता ही मगन हो रहा है।
नशा सिर्फ शराब नहीं, मादकता के दानव के दमन में युवा सिमट लिपट रहा है।
हीरोइन, हशीश, जाने क्या-क्या निगल रहा है,देश, समाज, परिवार, परवरिश की आशा, विश्वासों का गला घोंट रहा है।
बुद्धि नहीं है, फिर भी बुद्धिजीवी के खतरनाक इरादों की बलि रोज युवा आज अब चढ़ रहा है।
धर्म, कर्म से विमुख, छद्म धर्मनिरपेक्षता की बलि नित्य चढ़ रहा है।
मर्यादा मर रही प्रतिदिन, अत्याचार, अन्याय, भय, भ्रष्टाचार पर्याय युवा बन रहा है।
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।