आसमान...
रोज़ अकेले आसमान को ताकती हूँ,
उसमें कहीं खुद को तलाशती हूँ।
सब हैं यहाँ – लोग, रिश्ते, चेहरे,
फिर भी... कुछ तो अधूरा सा है।
उस ऊँचाई में एक तारा सा है,
जहाँ मेरी हर अधूरी ख्वाहिशें चमकती हैं।
वो आसमान - शांत सा, चुपचाप रहता है,
ना कोई सवाल, ना कोई जवाब।
पर मेरे पास... कहने को बहुत कुछ है,
पर वो... सुनता कहाँ है?
उसे आदत है छीन लेने की,
शायद इसलिए उसे घमंड है ऊँचा होने का।
हर बार इतराता है जब मुझे खामोश देखता है।
पर भूल जाता है जब बादल घिरते हैं,
तो उसी को छिपा देते हैं।