प्रकृति, तू मातंगी है —
गायन की पुकार में छिपा वह स्वर,
जो आत्मा से निकलकर ब्रह्म तक जाता है।
तू वह राग है,
जो मौन में भी गूंजता है।
तू संगीत है —
हर धड़कन की थाप में,
हर हवा की सरगम में,
हर नदी के कलकल में
और हर पक्षी के स्वर में बसी हुई शक्ति।
तू सभी प्राणियों की मधुर धुन है,
जो जन्म के पहले भी गूंजती है,
और मृत्यु के बाद भी लहरों में बहती है।
तेरी धुन में कोई भेद नहीं,
न ऊँच-नीच, न जात-पात।
तू तो बस तरंग है —
जो हृदय से निकलकर ब्रह्मांड तक फैलती है।
तू मातंगी है —
जो शब्द से परे,
पर शब्द में ही प्रकट।
जो वाणी नहीं,
पर वाणी की जननी है।
तू सरस्वती का रहस्यमय रूप है,
जहाँ मंत्र भी मौन हो जाते हैं,
और साधक स्वयं संगीत बन जाता है।