प्रकृति तू बगलामुखी है,
मन के तूफानों को थाम लेती है।
जहाँ विचारों की अशांति मचलती है,
तू वहाँ मौन की गहराई उतार देती है।
मानसिक चितन में तू स्थिरता भरती है,
चंचल बुद्धि को रोक कर
एक बिंदु पर टिकाती है।
जहाँ साधक विचलित होता है,
तू उसे भीतर की शक्ति से परिचित कराती है।
मनुष्य के जीवन में तू वह क्षण है,
जब सब कुछ थम जाता है —
न कोई भय, न कोई क्रोध,
न कोई भ्रम, न कोई मोह।
तू बोलती नहीं,
पर तेरी मौन उपस्थिति
सब वाद-विवाद को शांत कर देती है।
तू वाणी को बाँधती है,
पर आत्मा को मुक्त करती है।
तू शत्रु को रोकती है,
पर साधक को परम तक पहुंचाती है।
बगलामुखी! तू प्रलय की रेखा है,
जिसके आगे कुछ भी नहीं हिलता।
न सोच, न शब्द,
न संसार की गति।