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🌑 "काली – भय से मुक्ति की राह"
भय के सागर में जब डगमगाए मन,
तब उठी एक शक्ति — कालजयी सनन।
ना थी वह हिंसा, ना कोई क्रूरता,
थी बस चेतना की शुद्ध पूर्णता।
काली वह थी — अंधकार की रानी,
पर भीतर उजियारे की रखवाली ज्ञानी।
गले में मुंडमाला, पर हृदय में करुणा,
नृत्य उसका सत्य पर, और मृत्यु पर विजय-ध्वजा।
तंत्र नहीं व्यापार है, ना डर की कहानी,
यह तो साधक के भीतर की अनोखी रवानी।
जो भय से भागे, वह काली को न पाए,
जो भीतर झांके, वही सच्चा दीप जलाए।
श्मशान नहीं डरावना, वह तो शांति का द्वार,
जहाँ छूटे मोह-माया, और बुझे हर विकार।
मंत्र नहीं शब्द मात्र, वो है चेतना का स्पंदन,
जो साधे सच्चे भाव से, पाएं आत्मा का बंदन।
पहली महाविद्या, पहली पुकार,
"आओ, भीतर देखो, मिटाओ अंधकार!"
ना है वह अंधविश्वास की चाल,
वह तो है ज्ञान की महा-ज्योति की धार।