सब कुछ पाने की दौड़ में
सब कुछ हाथ से छूट गया
अब सब हो भी तो क्या फर्क पड़ता है
वो सुकून ही तो था
भीड़ में उलझन में खुशी की बूंद में
नाराज़गी की उद्येड़ में बाकी समय में
वहीं तो था....
वही तो था जो खोना नहीं था
वही तो बेड़ी थी जिससे बांध के रहना था
भी तो छोटा सा झोपड़ा था
जिसे घर बनाना था
रह गया वो सपना सपना ही
नहीं रहा कहने को कोई अपना भी
हर आस टूटने के बाद समेटा बहुत कुछ
पर अब समेटे हुए में मेरा रहा नहीं कुछ
जिसे चाहु आवाज दूं
जिसे चाहे पास बुला लूं
पर अब कोई दिलासा बचा नहीं
मुझमें बांटने लायक कुछ बचा नहीं
अब उस उम्मीद से भी डर है
कही कुछ कहना भी गलत है
जो हैं शून्य सा वो ही मैं
ना खुद में कुछ हु ना कही कुछ बन सकता है
जो हैं वहीं रहना हैं ना अब कही अपना घर ढूंढना है
जो आसरा होता तो कब के बस जाते
अब आस लगा कर खुद को थकाना बुरा है
हर दिन अब यही तराना है
खुद दुखी होना खुद रोना और फिर सम्भल जाना है
खुद को खुशी देना है खुद को सहेज के रखना है
अब इस शून्य को शून्य ही रहना है
सब कुछ पाने की दौड़ में
सब कुछ हाथ से छूट गया