और मैं अब तुम्हारे बिना भी जीना सिख गई हूं...क्योंकि मेरे पास इसके सिवा कोई ऑप्शन नहीं था...तुम्हारे जाने के बाद खुद को खत्म करने की कोशिश करते करते मैं इतना ही समझ पाई हूं कि जीना सीखना सबसे बड़ी कला है और कुछ हद तक मै भी इसे सीख चुकी हूं।
कई बार अनायास ही अतीत के गर्त में गोते लगा आती हूं जहां जाना मुझे खास पसंद नहीं है क्योंकि वहां जा कर मुझे तुम्हें खोने का अहसास होता है...लगता है जैसे तुम पास नहीं हो और ये अहसास मेरे लिए सबसे कष्टदायक होता है... मैं जल्द से जल्द उस दलदल से बाहर आना चाहती हूं पर उसी में धंसी चली जाती हूं...
पता नहीं कैसे लोग कह देते है कि वक्त हर जख्म को भर देता है...मुझे तो इतने सालों बाद भी तुम्हारी कमी ख़लती है जो आजीवन रहेगी।
इन 5 सालों में अनंत बार मैं ऊपर वाले के दरबार में अर्जी दे आई हूं कि वो मुझे तुम्हारे पास बुला ले पर वो भी हर बार अपने मन की करते है...कभी कभी मन की खामोशी को नजरअंदाज करने के लिए बिना मतलब की बाते करती रहती हूं...मुझे लगता है इससे मुझे परेशान होने का वक्त नहीं मिलता...और शायद यही सबसे अच्छा तरीका भी है अपनी उस त्रासदी में दोबारा न लौट पाने का। मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगी...मैं हर दिन बेहतर जी पाऊं ये कोशिश करती हूं...कई बार इसमें नाकामयाब भी होती हूं पर इतना तो चलता है ना।
मुझे यकीन है तुम मेरे पास हो और हमेशा रहोगी ❤️