रोज़ तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है ;
चाँद पागल है ..अँधेरे में निकल पड़ता है,.,
एक दीवाना मुसाफिर है मेरी आँखों में ;
वक़्त बे -वक़्त .. ठहर जता है ....चल पड़ता है ..
अपनी ताबीर के चक्कर में मेरा जगता ख्वाब ;
रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है,.,
रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं ;
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है .
उसकी याद आई है ....साँसों ! ज़रा आहिस्ता चलो ;
धडकनों से भी ....इबादत में ..खलल पड़ता है,.,!!