प्रकृति का गीत
भाग 1: धरती की गोद में
हरी-हरी वादियों में गूँजे, मधुर पवन के गीत,
कलकल नदियाँ बहती जाएँ, जैसे साज संगीत।
नीला अम्बर, सूरज चमके, किरणें बिखरें सुनहरी,
धरती माँ की गोद सुहानी, लगे सजीली दुल्हन सी।
भाग 2: पहाड़ों की पुकार
ऊँचे पर्वत, अडिग, अचल, नभ को छूते जाते,
बर्फ़ीली चोटियों पे जब, श्वेत चादर लहराते।
हिमगिरी कहे, "सुनो ऐ मानव, सदा रहो तुम अटल,
संघर्षों से मत घबराना, रखना हृदय विशाल।"
भाग 3: सागर का संदेश
नीला सागर लहरों संग, मधुर राग जब गाता,
गहराइयों में समाए कई, अनसुने कुछ नाते।
शांत कभी, तो क्रोध में उठे, लहरें गरजें जब,
समय सिखाए, संतुलन रखना, सहनशीलता तब।
भाग 4: वन की धड़कन
हरे-भरे जंगलों में गूँजे, कोयल की मीठी तान,
नाचते हिरण, उड़ते पंछी, हरियाली का वरदान।
बरगद, पीपल, नीम की छाया, शीतलता बरसाए,
जीवन देते, श्वास बचाते, खुद तप कर मिट जाएं।
भाग 5: वर्षा का वरदान
घनघोर घटाएँ जब घिर आएँ, धरती झूम उठे,
बूँदों संग जब पवन बहे, खेतों में हरियाली फूटे।चातक गाए, मोर नाचे, नदियाँ भर जाएँ जल से,
बंजर भूमि करे अरदास, "सृष्टि संवर जाए फिर से।"
भाग 6: पतझड़ की सीख
पीले पत्ते झर-झर गिरते, सूनी डालें रोती,
लेकिन वृक्ष नहीं घबराते, फिर से कोंपल होती।
पतझड़ कहता, "हर अंत नया आरंभ लाए,
जो गिरता है, वह उठता है, जीवन यही सिखाए।"
भाग 7: वसंत की बहार
फूलों की खुशबू जब छाए, बगिया खिलखिलाए,
तितलियाँ आकर गुनगुनाएँ, भँवरे भी इतराए।
धरती ओढ़े हरित चादर, प्रेम का संचार हो,
वसंत सिखाए, हर दुःख के बाद, खुशियों का संचार हो।
भाग 8: प्रकृति का संदेश
हे मानव, मेरी गोद न उजाड़ो, मैं ही जीवनदायिनी,
पेड़ कटेंगे, जल सूखेगा, यह दुनिया हो जाएगी सूनि।
संभालो मुझको, संवारो मुझको, मैं माँ हूँ तुम्हारी,
अगर मुझे बचाओगे, तो होगी दुनिया तुम्हारी।
-tapasya Singh