"Mera Bhi Koi Vajood Hai"
हर सुबह उठती हूँ मैं, सबसे पहले,
सजाती हूँ घर को, दिल से अकेले।
सबकी पसंद, सबकी खुशी का ख्याल,
पर मेरी दुनिया, बस एक सवाल।
क्या मैं सिर्फ एक परछाईं हूँ,
जो सबके पीछे छुपी कहीं हूँ?
या कोई एहसास, कोई अरमान,
जिसका भी है कोई सम्मान?
थाली सजे, पर भूख मेरी छूटे,
सबके चेहरे खिलें, पर आँख मेरी रूठे।
क्या किसी को एहसास है इस बात का,
कि मेरा भी कोई अस्तित्व है, जज़्बात का?
कभी बोझ लगती हूँ, कभी ज़रूरत,
कभी सेवा बन जाती है मेरी हकीकत।
पर एक दिन थक जाएगी ये हसरत,
कि कोई देखे मेरी भी अहमियत।
अब दूसरों की मर्ज़ी से जीना नहीं,
खुद से खुद को ही खोना नहीं।
अपने सपनों को सोने नहीं दूँगी,
अब मैं अपनी पहचान बनाऊँगी।