पहले एहसास की मीठी याद
न जाने कैसा था वो अनजाना बंधन,
ना कोई वादा, ना कोई अपनापन।
पर जब भी नज़रें उठती थी राहों में,
सामने बस वही चेहरा था निगाहों में।
हर रोज़ का मिलना, वो अनकही बातें,
चुपचाप निगाहों से बिखरी सौगातें।
कभी हौले से मुस्कुराना,
तो कभी नज़रों को चुपके से झुकाना।
पता नहीं वो चाहत थी या बस एक पसंद,
पर उसके साथ हर लम्हा देता था आनंद।
उसने कभी पूछा नहीं, मैंने कभी बताया नहीं,
उससे बेहतर ज़िंदगी में कोई आया नहीं।
अब बस एक हंसी याद है ज़ेहन में,
एक मीठा लम्हा बसा है यादों में।
कुछ सवाल अधूरे ही अच्छे लगते हैं,
कुछ एहसास बिना नाम के भी सजे लगते हैं।