गुलामी की जंजीरें
देखो, झुकी कमर, टूटी कलाई,
भारत माँ की लुट गई परछाई।
सपनों की धरती, शूरों का देश,
पर अब यहाँ बस दर्द और अवसाद का वेश।
धरती जो कभी सोने की थी चिड़िया,
गुलामी ने छीना उसका हर सपना।
पराए पांवों तले रौंदी गई,
आजादी की चाहत में मोम-सी पिघली।
खेतों में खून और पसीने का बहाव,
गुलामों की चीखों में था भारत का घाव।
आंखों में आँसू, दिल में थी आग,
पर थी जंजीरें, जो रोकें हर भाग।
पर हर रात के बाद सवेरा आता है,
दर्द के बाद सुकून भी गाता है।
भारत की धरती ने जगा दिया स्वाभिमान,
लाखों बलिदानों ने तोड़ा हर गुमान।
आज वो जंजीरें टूट चुकी हैं,
पर यादें उनकी अब भी रूठ चुकी हैं।
गुलामी के दर्द को कभी न भूलें,
आजादी की कीमत को दिल से छू लें।
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