ये लाज़मी नहीं बाहों के दरमियाँ भी रहे
मेरी दुआ है कि तू ख़ुश रहे जहां भी रहे
यही बहुत है कि नज़रों के सामने है वो शख्स
कहाँ लिखा है कि वो मुझ पे मेहरबाँ भी रहे
तू जाते जाते मुझे ऐसा ज़ख्म देता जा
के दर्द भी रहे ताउम्र, और निशाँ भी रहे
निगाह ए यार ने कल यूँ सम्भल के देखा मुझे
के तज़किरा भी ना हो और दास्तां भी रहे
निभा रहा है ताल्लुक़ वो इस तरह फारिस
के दोस्ती भी लगे, इश्क़ का गुमाँ भी रहे.!!