हिंदी बनाम पुस्तक मेलों की प्रासंगिकता
कल मुझे एक पुस्तक मेले में जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। परन्तु अनुभव बहुत कटु रहा । मैं एक पुस्तक स्टाल पर लगभग चार घंटे तक रहा। इस समय के दौरान बच्चों से लेकर बड़ी तक ने जितनी भी पुस्तकें खरीदी के सभी अंग्रेजी साहित्य की थी और केवल विदेशी लेखकों द्वारा लिखित । हिंदी में. लिखित एक भी पुस्तक नहीं खरीदी गई। मुझे यह समझ नहीं आया कि ऐसे पुस्तक मेलों के आयोजन की क्या प्रासंगिकता है, जिनमें मातृभाषा का तिरस्कार हो । क्या मातृभाषा का दायरा केवल साहित्यक सम्मान समारोहों के बंद कमरों तक ही सीमित है? इस स्थिति के लिए मैं हिंदी के साहित्यकारों को भी दोषी मनाता हूँ, क्योंकि इन्होंने भी कभी राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर आवाज नहीं उठाई। मैंने एक-दो बार यह मुद्दा उठाया, परन्तु किसी ने भी विशेष रुचि नहीं दिखाई। आज हिंदी साहित्य का क्षेत्र केवल पुस्तकों के विमोचन व मित्रों के साथ आदान-प्रदान तक सिमटकर रह गया है।
सरकारी स्तर पर भी प्रोत्साहन केवल कागजों की टिप्पणियों तक ही सीमित है तथा जमीनी स्तर पर कोई ठोस प्रयत्न नहीं किए गये हैं। यदि आप नॉर्वे देश में कोई पुस्तक प्रकाशित करते हैं, तो सरकार 1000 प्रतियां (बच्चों की पुस्तक के लिए 1500) खरीदेगी और उन्हें पूरे देश के पुस्तकालयों में वितरित करेगी। हमारे देश में केन्द्रीय व राज्य स्तर पर विभागीय तथा अन्य अनगिनत पुस्तकालय हैं जिनके लिए प्रतिवर्ष पुस्तकों की खरीद की जाती है। क्या मातृभाषा के हित में केन्द्रीय व राज्य सरकारे यहाँ भी यह प्रावधान नहीं कर सकती? ऐसा करने से एक तो मातृभाषा का प्रचार और प्रसार होगा और दूसरे साहित्यकारों को भी प्रोत्साहन मिलेगा ।
मेरा लेखक वर्ग से निवेदन है कि वह इस मुद्दे पर विचार करें और संगठित होकर अपनी-अपनी राज्य सरकारों के साथ यह मामला उठाएं ।