निगाह-ए-यार की ताबिश से जल रहा हूँ मैं
मुआर्र कैद ए मंजिल रंगत में ढल रहा हूँ मैं
हयात भर का सफर था ग़ुबार-ए-इश्क़ से
ख्याल ए हश्र में दे सरे-राह चल रहा हूँ मैं
ख़ुमार-ए-इश्क़ में हर सिम्त दिल धड़कता है
ख़्याल-ए-ज़ात में उल्फ़त में पल रहा हूँ मैं
तेरी निगाह के जान ए हसास की तमन्ना है
सुकूत-ए-दर्द में शम हर रंग मचल रहा हूँ मैं
हवादिस-ए-सफ़र या सराब-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा
यक़ीनन-ए-ख़्वाब यकदा ताबीर मिल रहा हूँ मैं
जुल्मत के ज़िक्र से रोशन है मेरी राहों का
फ़लक के नक़्श पे यूँ फ़सल कर रहा हूँ मैं
रह-ए-वफ़ा की क़सम दीजिए सदा मुझको
अश्कों की स्याही में सहर कलम रहा हूँ मैं
मुराद-ए-इश्क़ में ताबाँ है दिल का मंजर भी
ख़याल-ए-इश्क़ की रंगत से टहल रहा हूँ मैं
नज़र-ए-इश्क़ की पुरकैफ़ तिशनगी के लिए
हर लम्हा क़ैद-ए-ग़मों में पिघल रहा हूँ मैं
जुस्तुजू में हूँ, मैं बहर-ए-इश्क़ का मोहताज
गली की हवाओं में अज्र ए गजल रहा हूँ मैं
सुकूत-ए-शब में तिलिस्मात जब टूट जाते हैं
बजा तमाम हिज्र की राहों से चल रहा हूँ मैं
ख़्वाबों तिजारत में दम ए साहिल रहा हॅू मैं
कि रूह-ए-इश्क़ में बेदाग खलल रहा हूँ मैं
ग़ुबार-ए-इश्क़ ने हर सिम्त रख दी नज़्म मेरी
हज़ार क़ैद ए तलाशों में हक ए नकल रहा हूँ मैं
गुज़िश्ता लम्हा फ़िदा है बै कैफ आदमी में
हयात-ए-इश्क़ परवाज़ यें नफल रहा हूँ मैं
तिलिस्म-ए-दर्द की शिद्दत से बंधा हर सांस
कफ़स-ए-जाँ की घटाओं में हमल रहा हूँ मैं
रास्ता तेरे फ़लक आब औ दाना हस्ती तक है
इक अंजुमन में हसरत ए मुस्तकबल रहा हूँ मैं
तहक़ीक़ात-ए-शब-ओ-रोज़ की जमीं पर आज
सराब-ए-इश्क़ औ यक ब दलबदल रहा हूँ मैं
रह-ए-ख़ज़्रि में मख़फ़ी है रूक्न तेरा ही दीदार
निहाँ तअल्लुक़-ए-उल्फ़त से हंसल रहा हूँ मैं
रुख़-ए-हयात पर तेरी नज़र-ए-लुत्फ़ का असर
हर एक ग़म के तअल्लुक़ में आंन्चल रहा हूँ मैं
सफ़र में दिल की शिकस्ता सरिश्त, हमदम बन
ख़ुश्की-ए-तल्ख़ शबों में अफजल रहा हूँ मैं
हयात-ए-शब में सहर का नूर बाग ओ बुलबुल
तमाम दर्द-ए-हस्ती में दाग ए सबल रहा हूँ मैं
तसव्वुरात की बस्ती में तराना बेकरार हूँ मैं
कि आशना-ए-जुनूँ हूँ, और अफल रहा हूँ मैं
ख़्वाब-ए-मंजर में तमन्ना-ए-दीद की लौ है
फ़लसफ़ा-ए-इश्क़ की बुनियाद रख रहा हूँ मैं
मसर्रतों में मुसीबत का वजूद धुल के थकता है
तेरी रहमत की हर सदा में वक्ता बहल रहा हूँ मैं
बहार-ए-इश्क़ की दस्तार है सर-ए-महफ़िल
मुकद्दर में रहमत-ए-यार सुस्तावल रहा हूँ मैं
रह-ए-वफ़ा का हरीफ़ हूँ तिलिस्म की खातिर हूॅं में
रूह-ए-शायर का पैग़ाम लिक़ा में दखल रहा हूँ मैं
राहों की गर्द का शौक़ है मुझे अज़ल से, सनम
तमाम उम्र तेरा इंतज़ार बजाह अकल रहा हूँ मैं
शिकस्ता दिल की अज़ीयत की आग ए रूख हॅू में
खुलूस-ए-हिज्र में ग़मज़दा शाख ए गुल रहा हूँ मैं
-------
निगाह-ए-यार - प्रेमिका की दृष्टि, साथी की निगाह
ताबिश - चमक, प्रकाश
मुआर्र - मुक्त, स्वतंत्र
क़ैद-ए-मंजिल - मंज़िल की कैद, यात्रा की सीमा
ग़ुबार-ए-इश्क़ - प्रेम का धुंध, मोहब्बत की गर्द
हश्र - प्रलय, कयामत का दिन
सरे-राह - रास्ते पर, मार्ग में
ख़ुमार-ए-इश्क़ - प्रेम की मस्ती, इश्क़ का नशा
सिम्त - दिशा
ख़्याल-ए-ज़ात - आत्म-चिंतन
उल्फ़त - प्रेम, मोहब्बत
शम - दीपक, रोशनी
सुकूत - खामोशी
दर्द - पीड़ा
हवादिस-ए-सफ़र - यात्रा के हादसे, सफर की मुसीबतें
सराब-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा - प्रेम और वफ़ा का मृगतृष्णा, प्रेम की तृष्णा
यक़ीनन - निश्चित
ख़्वाब - सपना
ताबीर - अर्थ, व्याख्या
ज़िक्र - उल्लेख, जिक्र
फ़लक - आकाश, आसमान
नक़़्श - निशान, चिन्ह
फ़सल - काटना, फसल की तरह काटना
रह-ए-वफ़ा - वफ़ा का मार्ग, प्रेम और वफ़ादारी का रास्ता
स्याही - स्याही
सहर - सुबह
मुराद-ए-इश्क़ - प्रेम की अभिलाषा
ताबाँ - चमकता हुआ
मंजर - दृश्य
नज़र-ए-इश्क़ - प्रेम की दृष्टि
पुरकैफ़ - आनंदमय
तिशनगी - प्यास
ग़मों - दुःख, पीड़ाएँ
जुस्तुजू - खोज, तलाश
बहर-ए-इश्क़ - प्रेम का समुद्र
अज्र - पुरस्कार
ग़ज़ल - ग़ज़ल
सुकूत-ए-शब - रात की खामोशी
तिलिस्मात - जादू, रहस्य
हिज्र - वियोग
साहिल - किनारा
रूह - आत्मा
बेदाग - निर्दोष, स्वच्छ
ख़लल - बाधा
नज़्म - कविता
हक़ - अधिकार
नक़ल - नकल
फ़िदा - कुर्बान
नफल - अतिरिक्त
तिलिस्म-ए-दर्द - दर्द का जादू, पीड़ा का रहस्य
कफ़स-ए-जाँ - शरीर का पिंजरा
फ़लक आब औ दाना - संसार, प्रकृति
हसरत - अभिलाषा
मुस्तक़बिल - भविष्य
तहक़ीक़ात - अनुसंधान, खोज
सिराब - भरपूर, सिंचित
मख़फ़ी - छिपा हुआ
रूक्न - हिस्सा
तअल्लुक़ - संबंध
लिक़ा - मिलन
ज़िक्र - चर्चा
अजल - अनंत, कालातीत
अकल - विवेक
शिकस्ता - टूटा हुआ
खुलूस - सच्चाई
शाख ए गुल - फूल की शाख
------------
जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर
मननं कुरु, चिन्तनं कुरु, कर्मभावं धारय the importance of reflection, contemplation, and maintaining the spirit of action (karma). - लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें