Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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जीवन का आइना
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अब से कुछ पल पहले तक
सब कुछ ठीक ठाक था,
घर परिवार के सब लोग अपने में मगशूल थे
पड़ोसियों रिश्तेदारों को तो कुछ पता भी न था
शायद उनके लिए मैं लापता था
पर मुझे इससे कहाँ फर्क पड़ रहा था।
क्योंकि मुझे आने वाले अगले पल का पता था
उसके बाद क्या होगा उसका अच्छा अनुभव था
क्योंकि मैंने सब कुछ स्वयं देखा
और महसूस किया होता है।
छोड़िए! इन बातों में रखा ही क्या है?
असलियत मैं बताता हूँ
अपनी आड़ में आपकी भी औकात दिखाता हूँ,
जीवन के अकाट्य सत्य से मुलाकात कराता हूँ।
बस ! अभी अभी मेरे प्राण पखेरू उड़ गए
घर के सारे सदस्य विचलित हो गए,
इसलिए नहीं कि मैं मर गया
बल्कि इसलिए उनका सारा प्रोग्राम बिगड़ गया।
तसल्ली के लिए अस्पताल ले गये
डाक्टर के अनुसार मैं तो पहले ही मर चुका था
यहां लाने का मतलब ही बेमतलब था,
खैर! मेरा मृत्यु प्रमाण पत्र लेकर मुझे घर लेकर आ गए,
घर के बाहर चटाई डाल
उसके ऊपर एक पुरानी दरी डालकर
मुझे क्या मेरे शरीर को लिटा दिया।
जबरन रोना धोना सुनकर
पड़ोसियों का मजमा लगना शुरू हो गया
रिश्तेदारों शुभचिंतकों तक यह बात फैलाई जाने लगी।
लगभग दो घंटे तक ऐसा चलता रहा,
लोगों के आने जाने का सिलसिला भी चलता रहा,
आभासी माध्यमों से भी
कुछ लोग शोक संवेदना व्यक्त करते रहे,
तो कुछ सोशल मीडिया पर
मेरे जीवन अध्याय समापन का
प्रचार प्रसार कर लाइक, कमेंट का इंतजार करने लगे,
तो कुछ अंतिम संस्कार कब और कहां
होने की बात करने लगे।
अंततः अंतिम संस्कार के लिए
मुझे क्या मेरे शरीर को श्मशान ले आया गया।
लकड़ी की मचान पर लिटाया गया
ऊपर से और लकड़ियां रखकर
फिर आग लगाया गया।
पहले लकड़ियां और फिर मेरा शरीर जलने लगा,
कुछ लोग बाग जलपान के जुगाड़ में लग गए
तो कुछ अलग अलग गुटों में बैठ बतियाने
बेवजह तर्क वितर्क कर समय काटने लगे,
तो कुछ मेरी लाश जलने की
प्रतीक्षा करते करते उकताने लगे,
उनके मुखड़े पर तनाव के बादल छाने लगे।
दूर खड़ा मैं सब देख रहा था
जीवन का असल सत्य देख रहा,
मेरा शरीर तिल तिल कर जल रहा था
लगातार राख बनता जा रहा था,
जैसे जैसे मेरा जलता जा रहा था
लोगों का तनाव भी कम होता जा रहा था।
अंततः मैं जलकर राख हो गया
और मेरे जीवन का अध्याय खत्म हो गया।
कुछ ही देर में मेरे शरीर की राख
नदी में ढकेल कर वापस जाने लगे,
मैं भी उनके साथ हो लिया,
घाट पर कुछ ने स्नान, तो कुछ ने कंकड़ी स्नान किया, और फिर जमकर जलपान किया।
मैं टुकुर टुकुर उन सबको देखता रहा
कहीं मेरा जिक्र तक नहीं हो रहा था।
इसके बाद कुछ कहने की जरूरत नहीं समझता
इतना समझदार तो आप सब हैं ही,
फिर भी आपकी समझ में नहीं आ रहा
तो मेरा क्या कसूर?
जब आपके जीवन का आइना ही झूठा
या फिर आपका दंभ ऊँचा है,
जो जीवन का सत्य आपको
अपने ही आइने में नहीं दिखता है,
या फिर आपका आइना ही झूठा है।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 111956117
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