इस शहर में हर शख़्स अकेला नज़र आया
किसी को भीड़ में भी ख़ुद का पता न आया।
गलियों में उलझी हैं ख्वाहिशें मंज़िलों की,
हर मोड़ पर कोई किस्सा नया नज़र आया।
रौशनी ने ढक लिया अंधेरों का चेहरा,
मगर हर चेहरे पे एक साया नज़र आया।
बाज़ारों में बिकीं यहां ख़्वाबों की कहानियां,
कुछ बेवजह बिके, कुछ सस्ता नज़र आया।
इश्क़ भी मिला इस शहर की हवा में कहीं,
पर अक्सर अधूरा और थका नज़र आया।