कभी वस्ल ए दिल लगा कर देखिए,
सोज ए फिराक में जलाकर देखिए।
ख़ुशी आज निछावर है जुलाई कहाँ,
ज़ख़्म-ए-दिल को सजा कर देखिए।
इक नज़र से वह क़यामत तोड़ दें,
अपनी साँसों को बचाकर देखिए।
मसलन अब तमन्ना नहीं बाक़ी कोई,
दिल से पत्थर को पिघलाकर देखिए।
रंजिशों का सिलसिला है आज तक,
हक़ीक़त ए गुरबत भुलाकर देखिए।
फिराक ए यार रास ना आई जिसे,
उस अलविदाई को सज़ाकर देखिए।
हिज्ज्रा तेरे क़दमों में जहां बसता है,
ख़ुद को मिट्टी में मिलाकर देखिए।
शहर-ए-तन्हाई में वस्ल एक रोज़,
ख़ुद को आईना दिखाकर देखिए।
ख़ाल-ख़ाल साज़िशों में उलझे हुए हैं,
इश्क़ के हाथ तरबियत मिलाकर देखिए।
इक जफ़ा का सबक़ क्या है यहाँ,
हर सितम दिल पे उठा कर देखिए।
हर मोहलत थी शिकस्ता रात की,
दिल के परदे को गिराकर देखिए।
रहबर इक तसल्ली से नहीं आती सदा,
ख़्वाब ए फिराक ताबीर बना कर देखिए।
मयखाने में लोग कहते हैं मोहब्बत क्या है,
सुखनवरो उससे आँखें चुराकर देखिए।
खुद को इक सहर लाएगी बर्बादी ज़रूर,
इक साया दिल पे अमल बिठाकर देखिए।
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लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें ।