तकमील-ए-मोहब्बत
ये तमन्ना थी कि तुझसे नज़रें मिला लिया करते,
तेरे हुस्न को दिल की किताब बना लिया करते।
अश्कों में डूब के जलाय थे दिल के चिराग़,
इन्हीं आँखों से तेरा दीदार किया करते।
फ़िक्र-ए-जहान में उलझी थी मोहब्बत की राहें,
दिल-ए-बीमार दुआ में तेरा नाम लिया करते।
इश्क़ के समंदर में डूबा हूँ फ़ना होने को,
हर तकारीर में वुजूद को मिटा लिया करते।
बुत पुरसुकू की हर धड़कन तुझसे है ज़िंदा,
मय कदा हर सांस में तेरा ज़िक्र किया करते।
निगाहें झुका के तेरे क़दमों में बिछ जाते गर,
हर दैर-ओ-हरम में तुझे सज्दा किया करते।
काश तेरा नक़्श-ए-क़दम हासिल हो जाता,
इसी इबादत में दुनिया को भुला दिया करते।
ख़ामोशी के सायों में तेरे नाम का सूरज,
दिल के आईने में रौशनी से लिखा करते।
मोहब्बत में जो था, वो ज़माना गया कहां,
वे बस तेरी यादों से दिल बहलाया करते।
तेरी ख़ामोशियों में गूंजती थीं सदा-ए-मोहब्बत,
हर बात तेरी ज़ुबां से पहले सुन लिया करते।
सच्चाई का वो ख़्वाब दिखा है तेरे हुस्न में,
खैर आशिक़ अपने जुदाई को देखा करते।
हर गुनाह माफ़ हो जाता जो तुझे पाया होता,
उस्र जहां ख़ामोशी में तेरा ज़िक्र किया करते।
कुछ ना फलाही था तेरे इश्क़ में बसा हुआ,
दिल के दरवाज़ों पे नाम तेरा लिखा करते।
बिती हुई तमन्नाओं की तकमील अगर होती,
हर आसमा तेरे क़दमों में झुका दिया करते।
तुझे पाने की आरज़ू थी इस दिल ए दिदार,
सारे जहाँ से मोहब्बत का सौदा किया करते।
तेरे रक्स़ के हर क़िस्से में था कोई फ़साना,
मुकम्मल लफ़्ज़ वो अक्स बसा लिया करते।
करफिर ए मुस्क के जुनून में यूँ खोये थे हम,
तब्बस्सुम तेरे नाम सल ए वफा दिया करते।
फ़न-ए-इश्क़ में हासिल जो होता तेरा दीदार,
दुआ नही इबादत भी नज़रअंदाज़ किया करते।
तेरी राहों में क़दम रखे तो जन्नत मिल जाती,
ऐ गुनाह को तुझसे माफ़ी में डुबा लिया करते।
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लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित जुगल किशोर शर्मा बीकानेर ।