माँ सरस्वती वंदना
जय माँ विद्या ज्ञान दायिनी सरस्वती, वागीश्वरी नाम है तुम्हारा मूढ़ को तू ज्ञानी बनाए कृपा का हाथ हो जिस पर तुम्हारा।
शारदा बनकर तुम उपकार हो करती वाणी बनकर जिव्हा पर निवास तुम्हारा विद्या बनकर तुम जगतारिणी कहलाती तभी तो बुद्धिदात्री नाम है तुम्हारा।
तुम संगीत और कला की देवी हो मृतप्राय प्राणी में प्राण जगाती हो तुम्हारी मधुर वाणी में वो जादू है जिससे सपूर्ण ब्रांड को तुम भाती हो।
बसंत पंचमी प्राकटयोत्सव दिवस है तुम्हारा नैराश्य भाव को दूर भगाने वाली मोह रूपी अधकार को तुम हर लेती हो प्राणी जगत को सन्मार्ग दिखाने वाली।
हे माँ चंद्रवदनी पद्मासिनी द्युति मंगलकारी जन्म दिवस तुम्हारे पर महकती है फुलवारी ऐसा लगता है स्वर्ग पधारा हो वसुन्धरा पर चारों ओर होने लगती है जय-जयकार तुम्हारी।
जय माँ विद्या ज्ञान दायिनी
सरस्वती, वागीश्वरी नाम है
तुम्हारा तुम ने उसका बेड़ा पार लगाया
जिस ने भी है तुम्हें पुकारा