मैं और मेरे अह्सास
पैसे के जुगाड़ से जिंदग़ीयाँ पल रहीं हैं l
इसकी टोपी उसके सर ऐसे चल रही हैं ll
रोज चीजों के भाव आसमान छू रहे हैं l
महगाई के मार से हड्डियाँ गल रही हैं ll
मज़दूर वर्ग के लिए कमाई दुष्कर हुईं l
पांव के नीचे की ज़मीं हिल रही हैं ll
दोपहर को भूखा बच्चा रोटी लुटे तो l
दुनिया की निगाहों में खल रही हैं ll
खाये जाते बेदर्दी सब के पैसों को l
भ्रष्टाचारियों को डाकेटी फ़ल रही हैं ll
१२-९-२०२४
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह