आज मैं ‘पिल’ सिरीज देख रही थी । उसमें एक लड़की ने जैसे ही बुलेट स्टार्ट की वैसे ही छज्जे पर खड़ी दो महिलाओं ने तंज कसा - “कदि मोहल्ले की और लड़कियों की तरह बस भी पकड़ लिया कर , बुलेट चलाना जरुरी है ।”
लड़की का जवाब - “कलोनी की बाकी अंटियों की तरह घर में काम भी कर लिया करो, बाहर खड़े होकर मुँह चलाना जरुरी है ।”
ये संकीर्ण सोच का परिणाम है जो ये निर्धारित करती है कि जो काम पुरुष कर सकते हैं वो काम महिलाओं को नहीं करना चाहिए ।
इसी प्रकार के तंज मुझ पर भी कसे जा चुके हैं । दरअसल मेरे गाँव के लोग पूरी तरह से कृषि प्रधान हैं । उनके परिवार में सभी लोग मिलजुलकर खेतों में ही काम करते थे । लड़के दसवीं - बारहवीं पास करके फ़ौज में भर्ती हो जाते थे तो लड़कियाँ गाँव के ही स्कूल (जो कि केवल पाँचवीं कक्षा तक ही था ।) से पढ़ाई करती थी और फिर घर के कामों में हाथ बँटाती थी । जल्दी ही उनकी शादी कर दी जाती थी ।
मेरा सौभाग्य था कि मैंने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया जहाँ लड़के - लड़की में कोई भेदभाव नहीं किया जाता था । मेरे पापा ख़ुद एक शिक्षक थे तो भला अपनी बेटियों को क्यों नहीं पढ़ाते । हालांकि पापा ने कई बार गाँव के लोगों को लड़कियों को शिक्षा देने के बारे में समझाया पर कोई खास बदलाव नहीं आया । बस कुछ लोगों ने दसवीं पार ज़रूर कराई । मेरे घर आकर गाँव की कुछ महान दादियों ने लड़कियों को बाहर जाकर न पढ़ाने की गुहार कई बार लगाई पर मेरे पापा ने किसी की एक भी न सुनी । हालाँकि आज स्थिति बदल चुकी है और गाँव में काफ़ी परिवर्तन आ चुके हैं । लड़कियाँ अपने मनचाहे क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं लेकिन गाँव का पहला वो घर हमारा ही है जिस घर की बेटियों ने पढ़ - लिखकर अपने गाँव और घर का नाम रोशन किया । मैं यहाँ अपनी प्रशंसा नहीं कर रही हूँ, बस ये बताना चाहती हूँ कि पहल मेरे पापा ने की जिसके परिणामस्वरूप लोग अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए गाँव के बाहर भेजने लगे ।
मैं भी जब साइकिल लेकर निकलती थी तो कई दादियों के तानों का शिकार बनती थी । हद तो तब हो गई जब मेरे घर में बाइक आई और कुछ दिन बाद मैं अपनी बाइक पर मेरी दादी को मंदिर लेकर गई तो - “छोरी की जात सै, बाइक पे हाँडे सै ।” “मास्टर ने इस छोरी नै सिर पे चढ़ा रख्या सै जो गाँव में मोटरसाइकिल लेके फिरे सै ।” इस तरह के तानों ने मेरा मूड खराब कर दिया । जब मैंने ये बात मेरे पापा को बताई तो बोले इस कान से सुन और इस कान से निकाल । बोलने वालों की परवाह मत कर । तभी ज़िंदगी में खुश रह पाएगी । पापा की बात हमेशा याद रखती हूँ और ऐसे ही खुश रहती हूँ ।