दोहा - कहें सुधीर कविराय
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विविध
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आज द्रौपदी कह रही, कृष्ण खड़े क्यों मौन।
जिंदा मुरदे कह रहे , तुझे बचाए कौन।।
कहांँ आपको भान है, मन की मेरे पीर।
तभी आप हैं प्रेम से, करत घाव गंभीर।।
आपकी चिंता मैं करूँ, यह क्या कोई गुनाह।
कहाँ मांगता आपसे, दे दो मुझे पनाह।।
हारा अपने आप से, अब न जीत की चाह।
खुद मिल जाएगा मुझे, आगे की नव राह।।
जिसकी पावन धारणा, निज कामना पवित्र।
है जिसके सत्कर्म ही, दिखे साधना चित्र।।
झूठ- मूठ की दिव्यता, नहीं पालना धर्म।
व्यर्थ साधना आपकी, स्वयं जानिए मर्म।।
दिव्य धारणा आपकी, सकल भावना शुद्ध।
करें श्रेष्ठता कर्म भी, बन जाऐंगे बुद्ध।।
मेरी अपनी धारणा, मातु भारती मान।
नित्य साधना यह करूँ, आप लीजिए जान।।
कल कल नदिया बह रही, बिना राग या द्वेष।
कुछ भी नहीं अशेष है, सब ही लगे विशेष।।
गंगा सबकीमाथ है, नदी कहें कुछ लोग।
मर्यादा उसकी हरें , बदले में फल भोग।।
नदियों को हम मानते, निज जीवन का प्राण।
रौद्र रूप जब धारती, कर देती निष्प्राण।।
आज उपेक्षित हो रही, नदियां सारे देश।
नहीं समझ हम पा रहे, जो उसका संदेश।।
नदियां नाले सह रहे, प्रदूषण की मार।
दुश्मन बन बाधित करें, उनका जीवन सार।।
राज्य व्यवस्था फेल है, और केंद्र भी मौन।
ईश्वर को भी कब पता, सत्ताधारी कौन।।
जिम्मेदारी राज्य की, रखे केंद्र भी ध्यान।
जनता है सबसे बड़ी, इसका भी हो भान।।
नारी लुटती नित्य है, शासन सत्ता फेल।
राज्य केंद्र दोनों करें , रोज रोज ही खेल।।
तालमेल दिखता नहीं, केंद्र राज्य के बीच।
जनता पिसती रोज है, दोनों उसको खींच।।
करता है अब आदमी, नित्य दानवी काम।
और सर्वदा ले रहा, मर्यादा का नाम।।
आज मानवी शीश पर, चढ़ा लालची रंग।
बन दिखावटी बुद्ध वो, मानवता बदरंग।।
सूर्य किरण के साथ ही, होता है नित भोर।
बढ़ जाता है जगत में, प्रातकाल का शोर।।
सुबह सबेरे दे रहा, मैं तुमको आशीष।
मंगलकारी हो दिवस, और मिले बख्शीश।।
जाप वाप से कुछ नहीं, फर्क पड़ेगा मित्र।
पहले मन के चित्र को, करिए आप पवित्र।।
रखिए ऐसी भावना, मन में ना हो पाप।
फिर डर रहेगा दूर ही,शाप संग संताप।।
बिन कारण होता नहीं, जग में कोई काम।
आप मान लो बात यह, मत लो सिर इल्जाम।।
आज कौन लेता भला, नाहक ही सिरदर्द।
बिन कारण के आजकल, कौन उड़ाता गर्द।।
ऐसा लगता क्यों मुझे, सूना है संसार।।
बिना छंद के ज्ञान क्या, मेरा जीवन बेकार।।
बिना विचारे जो करे, ऐसे वैसे काम।
जब तब वो होता रहे, नाहक ही बदनाम।।
जब तक है श्रद्धा नहीं, जप तप सब बेकार।
होता है कुछ भी नहीं, क्यों करते तकरार।।
फैल रही है विश्व में, युद्ध नीति की रीति।
समझ नहीं क्यों आ रही, हमें बुद्ध की नीति।।
श्रद्दा से ही जाइए, गुरू शरण में आप।
मन शंका से हो रहित, तभी कटे संताप।।
व्याकुल भूत भविष्य में, नाहक हो हैरान।
जीना तो अब सीख लो, वर्तमान में जान।।
सीख हमें मत दीजिए, लेकर प्रभु का नाम।
करना है जो कीजिए, अपने मन का काम।।
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सुधीर श्रीवास्तव