दोहा - कहें सुधीर कविराय
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धार्मिक
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सूर्यदेव प्रभु कीजिए, मम जीवन परकाश।
नहीं चाहता आपसे, मिले मुझे आकाश।।
शनीदेव को कीजिए, अर्पित तिल अरु तेल।
जीवन से मिट जाएगा, बाधाओं का खेल।।
बजरंगी का ध्यान कर, जपिए जय श्री राम।
मन को रखकर नित्य ही, इतना करिए काम।।
प्रभु जी अब तो आप ही, करिए मेरा न्याय।
विनय करुं मैं आपसे, बंद करें अध्याय।।
ईश कृपा बिन हो नहीं , इस जग का कल्याण।
अब तो मानो आप भी, दिया उसी ने प्राण।।
वंदन गुरु जी आपका, अनुनय विनय हजार।
हमको भी समझाइए, छंदों का कुछ साल।।
ईश्वर से संबंध का, मिलता है आधार।
होत जहाँ संस्कार है, अरु विचार सत्कार।।
हनुमत मेरी भी सुनो, बस इतनी सी बात।
कुछ मेरी फरियाद है, कुछ मेरे जज़्बात।।
सीता माँ ने दे दिया, हनुमत को आदेश।
धरती पर रावण बढ़े, तुम कुछ करो विशेष।।
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सुख दुख
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सुख -दुख रहता है सदा, सबके जीवन साथ।
सुख आता तब हंस रहे, क्यों दुख माथे हाथ।।
सुख दुख मे रहिए सदा, हंसते गाते आप।
मत कहिएगा आप भी , दुख है केवल पाप।।
दो-धारी तलवार सी, सुख दुख का है वार।
इसके बिन होता कहाँ, जीवन नैया पार।।
सुख-दुख तो अभिलेख है, भाग्य कर्म का सार।
बस अच्छे रखिए सभी, अपने शुद्ध विचार।।
सुख -दुख में भी मत कभी ,आप कीजिए भेद।
दोनों में होते कहाँ, आपस में मतभेद।।
सुख के साथी हैं सभी, दुख में रहे ना एक।
जीवन में होता यही, मान रहे प्रत्येक।।
समय चक्र का खेल है, सुख दुख के निज दाँव।
कहीं धूप व्याकुल करे, कहीं शीतला छाँव।।
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लाचार / संस्कार
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हम ही तो शैतान हैं, बने हुए पाषाण।
दबा रहे आवाज को, हो नारी कल्याण।।
अपने तो संसार का, अपना है अंदाज।।
आप बड़े लाचार हैं,या फिर नव आगाज़।।
जनता क्यों लाचार है, बना हुआ पाषाण।
अग्रिम है आभार प्रभु, करो आप कल्याण।।
ईश्वर से संबंध का, मिलता है आधार।
होत जहाँ संस्कार है, अरु विचार सत्कार।।
माया के संसार को, मान लिया आधार।
बिगड़ा जब आचार है, तभी हुआ लाचार।।
नारी कब लाचार है, जान रहे हम आप।
अपने ही आवाज को, दबाकर करते पाप।।
कहने को संस्कार है, नारी है लाचार।
होता अत्याचार है, रुदन करें संसार।।
मात-पिता लाचार तो, करो आप उद्धार।।
मत भूलो संस्कार को, जो जीवन आधार।।
माना जो लाचार हैं, अरु आधार विहीन।
क्यों कहता संसार है, ये संस्कार अधीन।।
मन पंछी का जब करे, तब वो करे विदेह।
जल जाना ही है नियत है, किसे देह से नेह।।
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वाचाल
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माना वो वाचाल हैं, यह उसका संस्कार।
पाता कब सम्मान है, निज खोये आधार।।
निज जीवन निर्माण में, वाचलता है दंश।
आदत से लाचार जो, हो उसका विध्वंस।।
गर्व करो वाचाल हो, रखो स्वयं संभाल।
फर्क नहीं संस्कार से, नहिं होना बेहाल।।
कौन नहीं वाचाल है, क्यों मुझ पर आरोप।
शब्दों का भंडार है, किससे कम यह तोप।।
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सुधीर श्रीवास्तव