मैं और मेरे अह्सास
सरहद के पार सपने सुहाने देख रहा है कोई l
अपनों के फोटोग्राफ पुराने देख रहा है कोई ll
शर्म में दिन बीते इश्क़ की इतनी कहानी l
आसपास अपने बुलाने देख रहा है कोई ll
हुस्न को देखने तरसती रहती है निगाहें l
दिल ए नादान को चुराने देख रहा है कोई ll
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह