या तो मेरा मन मन्दिर हो
या तो मन में चैन बहुत हो,
या तो सारे सखा साथ हों
या तो एकान्त बहुत सहज हो।
घर पर घर की बातें हों
हँसने के संदर्भ बहुत हों,
आसमान के नक्षत्रों सा
जगमग अपना मन रहता हो।
जल की स्वच्छ धाराओं में
पवित्र भाव उमड़ता हो,
इस आने-जाने में
दृष्टि अलौकिक घुमड़ती हो।
वसुधा की बाहों में
स्नेहभाव पर्याप्त बना हो,
स्नेह की अटूट राह पर
संगम तीर्थ सा बना हुआ हो।
धुव्र तपस्या मन में हो
या संसार का भाव बड़ा हो,
रश्मिमों के संगम में
लक्ष्य सदा शुद्ध सफल हो।
* महेश रौतेला