आतिश-परस्ती
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हुस्न-ए-आला ने कीया आज़ाद गुलशन-ए-बरसती में।
शोला-ए-रुखसार छोर दी दुनिया, आतिश-परस्ती में।
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नवाजिश तन्हायाई-इत्मीनान सब घड़ी रुसवा’न पे,
गुज़ारा अक्ल-ओ-फिरासत में आबरू-ए-सरसती में।
आदाब-ए-इश्क में रहकर, हर सांस गुजारी हमने,
कहकशां-ए-इश्क था,बजाए सब कुछ इस बस्ती में।
श्बेसाया हर ज़र्रा था वफ़ा का हर नज़र थी दोस्ती,
सितारों से भी कम रोशन थी ज़िंदगी खुद-परस्ती में।
बजायह शराब-ए-इश्क पीकर न कोई शो’आर बना,
आरज़ू ने जला दीह जुदाई, इस बारभी झुमे रस्तगी में।
इमाम-ए-आशिक़ाँ था हर पल मेहरबां मुझ पर,
सितम-ए-इश्क का था ए’लान मेरी बस्ती में।
जिसने देखा वही था अपने नशा-ओ-शराब में,
जब द़गा दिया सब कुछ इस इश्क बुतपरस्ती में।
आये राह-ए-मोहब्बत के हसीन नक्श-ए-कदम,
हर एक राग था गूंजता इस खुशबू तंगेदस्ती में।
शायद के जन्नत थी समझे या कोई गुलज़ा का कोना,
फूल था खिलता उस हुस्न-ए-हयात ख्वारजांमस्ती में।
तवरा बुलायी थी हर हया’ए’शब एक नई दास्ताँ उसने,
नुमाया कहानी लिख गयी मेरी जिंदग्या सरेहपरस्ती है।
मिला जो दर्द-ए-इश्क यारब, उस हुस्न-ए-जवां से,
नुमांया पल था गुज़र जाता उस हिज्र जुंमा बरस्ती में।
मक़ाम-ए-इश्क़ था गरूर बस इक महफ़िल-ए-मासूम,
वो चिराग़ा था जलता जब इस शाम-ए-फाकाकष्ती़ में।
खुब शानासायी थी हर सांस से जुनूने उस आशिक की,
खैर ए बाद इक बात थी चुप इस जुनूबी बजाबष्ति में।
अष्यार षोकज़दा-ए-दिल नजर के ज़िंदगी बन गई,
लफज ए क़रार निजाम आरज़ू-ए-मुआफ शफाहस्ती में।
बेसक राज़-ए-हुस्न था खिलता क्या हर बात के जादू में,
जल्दबाजी अच्छी नहीं, हुस्न-ओ-शायरान फुरकामस्ती में।
मिला जो इश्क था बस इक कदम, रोशनी की तलाश,
ना सिंकदर ना आजम जज़्ब-ए-इश्क ना हमराह में।
दास्ता-ए-गुफतेगू उसको खोया ना कभी इस सफार पर,
हया-ए-मसरूफियत यू ज़िंदा इस गुलज़ार-ए-हस्ती में।
इल्माज ए मकामी दास्ताँ थी गुफ़्तगू इस शायरी में,
लफज ए सितम ज़िंदा इस काफिर-ए-बुतपरस्ती में।
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सप्रेम-स्वरचित मनोरजंन मनोरथपूर्ण भाव सहित
अकथ बस, नेपथ्य में बहुत कुछ सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य के मांनिद अपने आप मन के भाव को जोडे-समस्या को कसौटी पर परखे, केवल चितंन योग्य, मय आंनन्द
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