तल्लीताल डाकघर पर
कहाँ बैठा जाता है
मुझे मालूम है।
बस अड्डे पर किस बस को देखना है
मुझे पता है।
किस राह से छात्रावासों को जाया जाता है
मेरे मन में तैर रहा है।
कौन-कौन पेड़ कहाँ हैं
मुझे दिख रहे हैं।
प्यार के गुंजन को
कहाँ गुनगुनाना है,
मेरे कंठ में है।
वह जो हवा की तरह
मेरे पास से निकलती है
कह जाती है-
"दिल दिया----।"
मैं पहुँच चुका हूँ
लेकिन समाधिस्थ लग रहा हूँ,
वह भी है,मैं भी हूँ
लेकिन समाधिस्थ हूँ।
*** महेश रौतेला