॥ मजदूर दिवस पर सृजित मेरी एक बहुचर्चित कविता ॥
आज की रोटी बड़ी दुर्लभ हो गई ,
रोटी, रोटी न रही, सोना, चांदी हो गई l
रोटी से है जीवन, सुना था हमने,
पर आज तो जिन्दगी ही रोटी हो गई l
अच्छा ही रहा कोरोना तुम लील गए,
कितने ही रोटी के मारों को l
पल पल मरने से तो अच्छा है,
मरने दो एक वार ही , हालात के मारों को l
क्या क्या हमसे नहीं कराती है रोटी,
कड़ी दोपहर में पसीने से नहलाती है रोटी l
खड़े रहने की जिसकी हिम्मत नहीं,
उससे पहाड़ के भाटे ढुलवाती है रोटी l
धरती पे कहाँ, अब तो आसमान पे टंगी है रोटी,
रेगिस्तान में पानी सी कहानी बन गई है रोटी l
सोचो रोटी पेड़ पर लगी होती,
तो वाकई कितनी अच्छी होती l
भले ही मुश्किल से मिलती,
पर पहुंच से दूर तो नहीं होती l
पूंजीपतियों की तृष्णा लील गई है रोटी,
या भ्रष्टाचार की बलि चड़ गई है रोटी l
गरीबी की रेखा, तूने कहीं रोटी को देखा,
ओ,मनरेगा कहाँ है रोटी, तू क्या कहेगा l
अरे, सब कुछ देने का वादा करने वालो,
दो जून की नहीं तो, कम से कम ,
एक मई की रोटी ही दिलवा दो l