शर्त लगी महबूबा के इश्क़ को आजमाने की,
अल्फाज लफ्ज से उतरे कायनात के बीते जमाने की,
ये शीशक् शिशक् कर रोये इम्तिहां ना पूरी हुई रोते तक,
परेशानी ग़ैरत ए अंगत् जिस्म से रह्ह् की बनी एक आश तक,
वो समजेगा यही खवाब पर ,फनाह होते रहे हर सदमे तक,
बंदगी दूरी कर देगी पलके जुकी रहेगी किताबे सुनी पड़ेगी एक वक़्त पर,
वो आँखरी सांस ले रहा था कम्बख्त लोग हस्ते रहे तड़पते हुवे मरते तक,
DEAR ZINDAGI 🙏