शायद उस शहर तक मैं पहुँच नहीं पाऊँगा
जहाँ तुम रहती हो।
शायद मैं उससे दूर कहीं पीछे छूट जाऊँगा अपनी यात्रा में—
संभव है उसी यात्रा में अंत मेरा हो
तुम्हें देखे बिना।
फिर भी अपनी कल्पना में मैं तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी आँखे, तुम्हारे होंठ, सब गढ़ लूँगा।
या फिर मैं यूँ सोचूँगा
कि तुम एक गुलाबी फूल हो
उस मरु में अकेला कहीं पड़ा हुआ।
―रुस्तम.❤️