मैने उन्हें
पचास, साठ,सत्तर, अस्सी, नब्बे की उम्र में देखा
जब स्वस्थ थे, उदार थे
हँसते खिलखिलाते थे,
आशा-आकाक्षांओं को ऊँचा कर
एक जगमग सा संसार रचते थे,
दूध सी श्वेत बात कर
मन में विश्वास जगाते थे।
यदा कदा राष्ट्र की बात करते थे
बसंत की सुषमा में
वृक्ष सा फल-फूल
पतझड़ के लिए तैयार मिलते थे।
नदी सा बहते थे
अनेकों तीर्थ समेटे
खारे समुद्र में मिलने का संकल्प रखते थे।
** महेश रौतेला