ठहर जाऊँ बूँदे बनकर तेरे लब्जो पर।
हरबार तु गिरा देती आँखों से बुँदे बनाकर।
संभाल रखा था इन बूँदों को तहखाने मे,
कातिल नज़रो ने खोल दिया तहखाने को।
यह बुँदे नही ,नदी बनकर बहते रात भर,
इश्क की सजा भला इन बूँदों को क्यों?
अगर आज भी इश्क है, तो है उससे,
इसमें भला इन बुंदो का गुनाह क्या?
माना की आँखों से बहना उसकी फितरत है,
तो भला दर्द के क्यों, खुशी बनकर बहे आँसु।
आँखोंको छोड़कर गिरे आँसू धरा पर ' राज',
कपकपा उठी धरा भी मेरे इश्क की आग से।
भरत (राज)