।।ॐ।।
स्तुति
श्री गणेश जी स्तुति
जय जय हे गणपति गजवंदन
जय जय हे शिव गौरी के नंदन।१
रिद्धि सिद्धियों के तुम हो दाता
हे एक दन्त विद्या विभा विधाता।२
वेद पुराणों में व्याख्यान तुम्हारा
हे मोदक प्रिय प्रभु नाम तुम्हारा।३
हे लम्बोदर, जीव जगत के स्वामी।
कृपा रखो सदा बनकर पथ गामी४
आप ही कृपा से नित लक्ष्मी आती
सदा मां शारदा गुण ज्ञान सीखाती ।५
माता श्री सरस्वती जी स्तुति
वीणा वादनी ज्ञान दायिनी, नतमस्तक महिमा गाऊं।
दिव्य रूप को पल- पल निहारूं, फूले नहीं समाऊं।।१
ब्रह्म कलश से अवतरण तुम्हारा, हे विद्या महारानी।
वसंत पंचमी को भव में आई, बनकर ब्रह्म की बानी।२
कर में वीणा सुंदर सुशोभित, राजहंस की सवारी।
गुण ज्ञान की दात्रि देवी मां, समस्त सृष्टि आभारी।।३
सुशुप्त जग को अमृत ज्ञान से, माता तुमने जगाया।
स्वर संगीत साहित्य का, जग को ध्वनि ज्ञान कराया।४
वेद पुराण उपनिषद गंथों में, यशस्वी यश तुम्हारा।
भारत भूमि पर सदा बरसाई, अखंड ज्ञान की धारा।५
विद्या वर देकर ममता, आर्यावर्त को विश्व गुरु बनाया।
हे मां शारदा तुमने जग को, ब्रह्मज्ञान से सजाया।६
यमज सुत की विनय वंदना मां, चरणों में बस जाऊं।
वीणा वादनी ज्ञान दायिनी, नतमस्तक महिमा गाऊं।७
श्री सूर्यदेव जी स्तुति
हे देव दिवाकर देवा, जगत के पालन हारी।
तीनों लोक स्तुति गाते , नित वंदना में तुम्हारी।।१
षष्ठ ऋतुओं के पालक, हे दिव्य रथ के गामी।
ब्रम्हा विष्णु महेश आप हो, हे जगत के स्वामी।।२
एक वृत स्वर्ण रथ पर, अरुण सारथि प्यारा।
सदा सुशोभित भव पाए, आशीर्वाद तुम्हारा।।३
प्रातः काल की सादर स्तुति, ओजस्वी बनाती।
मंगल रूप शक्ति प्रभु, जीवन गति सीखाती।।४
सायंकाल का समय, प्राणों का पोषण दाता।
वेद पुराण उपनिषद गाये, सदा यशस्वी गाथा।।५
माता श्री गंगा जी स्तुति
जय जय गंगा भगीरथ नंदिनी
जय जय ऋषि मुनि चंद चंदिनी।।
पुष्प अर्पित तीनों लोक हैं करते
देव दानव नर सुख सभी भरते।।
शिव की घनी जटाओं में रहती
धारा निकली गौमुख से बहती।।
हे गंगे पूज्य महा मोक्षदायिनी
परम सुख सुंदरी पतित पावनी।।
युग युग गाए यमज यशस्वी गाथा
पद पंकज वंदना हे गंगा माता।।
माता श्री सरयू जी स्तुति
मधुर मधुर बहे पावनी, जल की निर्मल धारा।
शशिप्रभा तुम हरि नयन की,सरयू नाम तुम्हारा।।१
वैवस्वत राजन ब्रह्म कलश से अवध पुरी में लाए।
देव दानव,नर खग मृग ने, पुण्य के फल पाए।।२
ममतामई हे माता सरयू, आपकी अमर कहानी।
झिलमिल झिलमिल बहता, पावन पावन पानी।।३
अवधपुरी के उत्तर में, उत्तरायण होकर बहती।
अन्न धन्न पोषण करने वाली, प्रजा जननी कहती।।४
रोग दोष से मुक्त करती, जिसने वत्सलता पायी।
गोद खिलाया प्रभु राम को, रघुनंदन मां कहलायी।।५
यश तुम्हारा ऋषियों ने गाया, हे सरयू सुखकारी।
तीनों लोक वंदना करते, हे माता सरयू प्यारी।।६
निर्मल धारा युगों युगों से, कलकल बहती आयी।
प्रभु राम ने ममता भरी, वंदना यशस्वी गायी।।७
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