मैंने कहा-
सूरज अपने यहाँ भी उगता है
नदी कल-कल बहती है,
शिखरों पर धूप पहले आती है
खेतों में हल जोता जाता है।
वृक्षारोपण होता है
बुरुंश खूब फूलता है,
काफल लाल होकर झड़ते हैं
रात को नक्षत्रों तक दृष्टि जाती है
समझ निश्छल होती है।
गहन रात में बाघ आता है,
जो जहाँ हाथ लगता है
उसे उठा ले जाता है।
** महेश रौतेला