तुम!
कौन से लफ्ज़ उधार मांग कर लाऊँ उर्दू की ज़ुबान से,
जिसमें तुम्हारी तारीफ करूँ
तो तुम जितनी ख़ूबसूरत कर सकूँ!
कौन सी आकाश गंगा से ढूंढ कर लाऊँ ऐसा सूरज
जिससे तुम्हारे तेज को उपमा दे सकूँ!
कौन सा सागर ऐसा ढूंढ कर लाऊँ
जो,मेरी तुम्हारे लिए मोहब्बत है
उससे भी ज़्यादा गहराई रखता हो!
कौन सा वो चाँद ढूंढ कर लाऊँ
जिसकी चांदनी
मेरे ह्रदय के समान,तुम्हारे प्रति शीतलता रखती हो!
कहाँ से ढूंढ कर लाऊँ ऐसा फूल
जिसकी खुशबु मेरे इश्क़ के इत्र से ज़्यादा महकदार हो!
कहाँ से ढूंढ कर लाऊं ऐसी नदी
जिसका पानी तुम्हारे लिए मेरे मन की
भावनाओ से ज़्यादा निर्मल और पावन हो!
कहाँ से ढूंढ कर लाऊँ ऐसा कुछ भी
जिससे तुम्हारे लिए मेरे मन में जो प्यार है
उसकी तुलना कर सकूँ और
कह सकूँ कि यहाँ मेरा प्यार कम पड़ गया!
और,
कहाँ से ढूंढ कर लाऊँ अब ऐसा जीवन
जो तुम बिन अब जीया जा सकेगा!
नहीं, अब ये मुमकिन नहीं
मेरे जीवन के तुम पर्याय बन चुके हो!
मेरा वायु की गति से तेज़ दौड़ने वाला मन
अब सिर्फ तुम तक पहुंचना चाहता है
सिर्फ तुम!