ये जिन्दगी
तुझे मैं क्या कहूँ
ये किस रास्ते पे लाकर खड़ा कर दिया मुझे
जहाँ उम्मीदो के भी
सभी रास्ते बन्द हो गया
वो गुजरे आज हमारे ही पहलू से
मगर पता नही क्यों
आज वो किसीका बेटा
किसी का पति लगा
ये जिन्दगी
तूझे मैं क्या कहूँ
एक फोन पर उसके
मै गई दौड़कर
जी ने चाहा मन भर कर देख लूँ उसे
मगर
उसकी तरफ निगाह उठी ही नही
कुछ समझ नही आया
लगा कि जैसे मैं ठगी सी रह गई
वह चला गया और मैं वही खडी रह गई
ये जिन्दगी
तुझे मैं क्या कहूँ
ये किस रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है तूने मुझे
उसे भूलना भी नही है
और याद भी नही रखना है
पास नही जाना है उसके
मगर दूर भी नही रहना
पाना नही है उसे
मगर जीवन के अन्तिम छड़ो तक
उसके साथ रहना है
जीवन के ऐसे कशमकश में
तूने उलझा दिया
ऐ जिन्दगी
तुझे मैं अब क्या कहूँ। ।
मीरा सिंह