मैं स्वार्थी इंसान हूं।
कल मैं जो जमीन पे गिर पड़ा; वह बिल्कुल भी न अच्छा- था।
थी वह भगवान की मर्जी इसलिए सोचता कितना अच्छा था।
इससे भी अच्छा हो सकता था; मैं सोचता यह शैतान हूं!
मैं स्वार्थी इंसान हूं।
मुझे भगवन रोज बनाता है, मुझे खुदा पकड़ के चलाता है।
उस वीर बुद्ध की ख्वाबों में; मेरा तन मन जाना चाहता है।
पर खुद का भला मैं सोचता; मैं एक पागल हैवान हूं!
मैं स्वार्थी इंसान हूं।
मन बच्चों का आज तड़पता है; बुड्ढौं कि मैं क्या बात करूं?!
मेरे ही हजारों चेहरे हैं; मैं खुद की क्या औकात गढूं?!
क्या मजबूरी की दहलीजों पर खड़े युवा की बात करूं?!
मजदूर ढूंढता है रोटी में देख खड़ा अनजान हूं!
मैं स्वार्थी इंसान हूं.
है पिता ओल्ड-एज होम में; माता का मान है भंग पड़ा!
है सुनसान सी गलियों में; सीता का आंचल तंग खड़ा!
किस द्रौपदी को बचाऊं मैं? उस कृष्ण के मन में भी जंग छिड़ा!
सब जान के भी अब मौन कहो मैं मानव कितना महान हुं?!
मैं स्वार्थी इंसान हूं।
ईश्वर वह हमें बनाता है, प्रगति के बाद मिटाता है।
अपने खिलौने के टूटने पर क्या आंसू आंख में लाता है?:
और आता हो आंसू तो क्या वह मुझे आके दिखलाता है?
उस तड़प रहे ईश्वर की देखो मैं जाहिल संतान हूं!
मैं मानव बड़ा महान हूं।