संवेदना
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संवेदना !
तू रक्षा कवच
मानवता का
तू नहीं, जीवन नहीं
तू स्नेह, प्यार, दुलार
तेरा हर रूप करतार
तू शिव की तीसरी आँख
तू विकट, सरल, कोमल आभास
हृदय की सतह पर पिघलती मोम
तू तांडव कभी रास
रक्षा का तू आभास
तू धरती, तू ही व्योम
तेरे बिन प्राणी कौन
तू आकार, प्रकार, विकार
हर आस में, विश्वास में
कर्म क्षण में, अवकाश में
अक्षर अक्षर वास तेरा
हर पल अनुप्रास भरा
मौन में तू, वाचा में तू
संबंध की धरा है
तेरे बिन मृत अहसास
इश्क़ की दास्तान
फकीरों का पैगाम
सर्वस्व हरा भरा है
साँसों का काफ़िला है
तू जान,मान,महाप्राण
भौतिक से आध्यात्म
धरा से आकाश
जीवन का आदि अंत
जीवन की धुरी तू
शेष तू, विशेष तू----
डॉ. प्रणव भारती