Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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दौलत
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धन दौलत जीवन की जरूरत है
इससे भला किसे इंकार है,
लेकिन संबंधों की दौलत को ठुकरा कर
हम खुशहाल नहीं रह पाते
चलते फिरते मशीन बन भटकते रहते हैं ।
दौलत की चकाचौंध में
हम अपनों से भी दूर होते जाते हैं,
मृगतृष्णा बन भटकते रह जाते हैं।
तब यही दौलत हमें मुंह चिढ़ाती है
हमारा मजाक उड़ाती है,
संबंधों की दौलत के आगे
ये दौलत फीकी नजर आती है।
मगर तब तक हम बहुत कुछ खो चुके होते हैं
दौलत की आड़ में हम भले ही बड़े आदमी कहलाते हैं
पर किसी भिखारी की तरह
संबंधों की दौलत में सबसे गरीब नजर आते हैं।
बड़े काम की ये जो दौलत है
तब किसी काम नहीं आती है।

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश
© मौलिक स्वरचित
३१.०५.२०२३

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 111879693
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