छल-छल,कल-कल करता है मन
विद्युत सा रहता है मन,
विरह-वेदना सहता है मन
खुशियां अनन्त रखता है मन।
पता उसका ले आता मन
भगदड़ कैसी मचाता है मन,
मन्दिर भी होता है मन
बड़ी विजय दिलाता है मन।
कितने रिश्ते रखता है मन
तीर्थ अनेकों करता है मन,
जीवन को गोड़-गाड़कर
सदा उर्वरक रखता है मन।
नक्षत्रों सा टिमटिम करता
गंगा जैसा बहता है मन,
आते-जाते हठ में रहता
शुभ्र हिमालय सा रहता है मन।
* महेश रौतेला