मैं तुझे नदी कहूँ
तू मुझे समुद्र कह,
तू सदा मधुर रहे
मैं खारा ही भला।
तू सदा धरा रहे
मैं उड़ता बादल रहूँ,
तू सदा हरी रहे
मैं रिमझिम बरसा करूँ।
मैं तुझे वृक्ष कहूँ
तू मुझे जंगल बना,
तू सदा खिला करे
मैं सदा उगा करूँ।
तू प्रकृति का प्यार बने
मैं प्रकृति से प्यार करूँ,
जहाँ कृष्ण कहते रहें
"मैं पृथ्वी की सुगन्ध हूँ।"
* महेश रौतेला