कभी मन को मुड़ने न दिया ,
तुम्हारे प्रेम मे सबकुछ देखा मैने !
तुम तो मुझे भीतर से देखते हो न?
फिर भी मुझमे इतनी कमी?
मै शब्दों का पर्वत खड़ा कर दूँ बेशक ! ,
जो तुम भीतर हो तो तुम्हे भीतर से
गुजरती नदी न दिखी ?
संसार मुझे कभी समझ न पाया ,
तुम भी असमर्थ थे, हो क्या ?
हूँ कठिन प्रश्न तुम्हारे लिए भी क्या ?
मैने कभी सामर्थ्य खुद का जाना ,
विवेक ,बुद्धि , भावना सब तुमसे होकर
ही माना | फिर मुझमे अंंहकार मेरा कहाँ
से आया ? और जो है तो वह किसका है ?
किसमे है ?...