हे गजानन भाई मेरे ,
जैसी भी हूँ बहन तुम्हारी,
छोटी हूँ स्नेह बड़ा दो ,
नही समझती दुनिया मुझको
दिखती मुझमे लाख बुराई ,
होंगी कहाँ मना करती हूँ |
तुम भीतर बैठे रहना बस ,
नही बिदकना लोगो के सम |
धीरे - धीरे छूट गये सब ,
कहने को बाजर लगा है |
रिश्तों का संसार सजा है,
लिये खड़े है पर्चे सब ,
भरी शिकायत जिसमे अब ,
नही बचा है प्रेम किसी मे धन-दौलत
सम्मान है बस |
माँग रही दुआ आपसे,
दे दो जिसकी जो इच्छा हो |
नही सम्भलता बोझ देह का उसपर
भार रखा साँसो का |
कब टहलूँ लेकर
इसको अर्थहीन अनइच्छा से |