इसलिए अन्तर्मुखी होकर अपनी अन्तर्चेतना के तले में देखेंगे तो हमारा देवत्व सुप्त अवस्था में पड़ा हुआ मिल जाएगा । केवल मन और बुद्धि की एकाग्रता के बल से व्यर्थ के कचरे को हटाकर उस देवत्व के दर्शन स्वयं के भीतर करें और उसे झाड़-फूंककर स्वच्छ करें । उस पर पड़ी हुई विकारों की धूल, मिट्टी और परत को हटाएं । एक बार देवत्व जागृत हो गया तो अध्यात्म का दीपक स्वतः ही प्रज्वलित हो जाएगा जो जीवन की सभी अंधकारमय विषमताएं विलुप्त कर देगा।
कहा जाता है कि कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर मनचाही उपलब्धियां अर्जित हो सकती है, किन्तु धरती पर इस कल्पवृक्ष के वास्तविक अस्तित्व स्थल का किसी को ज्ञान नहीं । सच्चाई यह है कि मनुष्य स्वयं के विचारों से अपने व्यक्तित्व रूपी कल्पवृक्ष जन्म देकर उसे विकसित करता है । आत्मा या अन्तर्चेतना की भूमि पर जिन विचारों के बीज अंकुरित किए जाएंगे, वैसे ही व्यक्तित्व का ढांचा निर्मित होगा ।
हर समस्या के समाधान की बात घूम फिरकर विचारों की गुणवक्ता पर आकर अटक जाती है । इंसान के लिए विचारों पर नियन्त्रण या उन्हें संशोधित करना चांद पर जाने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। लेकिन विधिपूर्वक किया गया कोई भी कार्य कठिन नहीं होता।
आज विश्व में अनेक कार्यों को निस्पादित करने की प्रणालियां और विधियां लागू है । हर स्थान विशेष के अपने अपने नियम और विधि विधान हैं । सड़क पर चलने के नियम भी हैं तो वाहन चलाने के नियम भी हैं । सरकारी कार्यालयों के नियम हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका आदि व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के नियम और विधान हैं । जनता के जीवन को सुखद व सुगम बनाने के लिए तथा निर्विघ्न रुप से देश की प्रगति के लिए नियम और विधान लागू किए जाते हैं ।
इसी प्रकार चिन्तन करने और विचार करने के भी कुछ नियम और विधान है, किन्तु इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता । विधेयात्मक और सृजनात्मक चिन्तन ही आत्मशुद्धि करते हुए मनोबल बढ़ाता है जो कर्म व्यवहार के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है जिससे श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण होता है । एक क्षुद्र भी सतत शुद्ध चिन्तन द्वारा श्रेष्ठ व्यक्तित्व की सम्पदा से भरपूर हो सकता है ।
इसलिए अन्तर्मुखी होकर पंच तत्वों के विनाशी शरीर से पृथक अपने आत्म स्वरूप और उसके सप्त गुणों अर्थात् ज्ञान, शांति पवित्रता, प्रेम, सुख आनन्द और शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करें । अपने हर कर्म व्यवहार में आत्मा के इन्हीं गुणों को आधार बनाएं । तब आपकी आत्मसत्ता से दिव्य और पवित्र विचारों की गंगोत्री निकलेगी जिससे शुद्ध संकल्पों के बीज अंकुरित होंगे जिससे आपके भीतर सुप्त पड़े देवत्व का पुनर्जागरण होगा ।