Hindi Quote in Blog by JUGAL KISHORE SHARMA

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स्वाज्ञानासुरराड्ग्रासस्वज्ञाननरकेसरी ।

प्रतियोगिविनिर्मुक्तं ब्रह्ममात्रं करोतु माम् ॥



ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो

बलमिन्द्रियाणि च ॥ सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं

ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरण-

मस्त्वनिराकरणं मेस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते

मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥

ए को द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।

अयमेव हिते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥





तहां शिष्य प्रश्न करता है कि, शुद्ध, एक, नित्य मुक्त ऐसा जो आत्मा है तिस का बंधन किस निमित्त से होता है कि, जिस बंधन के छुटान के अर्थ बडे २ योगी पुरुष यत्न करते हैं ? तहां गुरु समाधान करते हैं कि, हे शिष्य ! तू अद्वितीय सर्वसाक्षी सर्वदा मुक्त है, तू जो द्रष्टा को द्रष्टा न जानकर अन्य जानता है य ही बंधन है । सर्व प्राणियों में विद्यमान आत्मा एक ही है और अभिमानी जीव के जन्मजन्मांतर ग्रहण करनेपर भी आत्मा सर्वदा मुक्त है । तहां शिष्य प्रश्न करता है कि, फिर संसारबंध क्या वस्तु है ? तिस का गुरु समाधान करते हैं कि, यह प्रत्यक्ष देहाभिमान ही संसारबंधन है अर्थात् यह कार्य करता हूं, यह भोग करता हूं इत्यादि ज्ञान ही संसारबंधन है, वास्तव में आत्मा निर्लेप है, तथापि देह और मन के भोग को आत्मा का भोग मानकर बद्धसा हो जाता है ॥ Ashtavakra Gita

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