किसी भी क्षण किस्मत को बदलते देखा है
मैने नाव को रेत पे चलते देखा है
उड़ी थीं अफवाहें जिनके बेहद बेहोश होने की,
उनको भी वक्त पे संभलते देखा है ।
आ गईं अगर अड़चनें तो क्या होगा
बहुत होगा तो रास्ता तबाह होगा,
पर उन रास्तों की कड़ियां तुम जोड़ते जाना,
बिखरीं कड़ियों को भी आपस में जुड़कर जंजीर में बदलते देखा है ।
तो क्या हुआ जो मंजिल जिद्दी हैं,
जिद्दी तुम भी कुछ कम नहीं,
बस क्षमता इतनी रखो कि लगे,
जो पीछे हटे तो हम नहीं,
सही समय पर सही आग में सख्त लोहे को भी पिघलते देखा है।