हर एक वजह मै खुद पर
मान बैठती हूँ ,
हूँ मै ही , नाहक जान बैठती हूँ |
शायद बदल न पाई हूँ खुद को ,
बदलना मेरे लिए आसान नही |
इस न बदल पाने की आदत ने ही ,
मुझे हर वक्त लूटा , जिन्दगी मे मुझसे ,
क्या - क्या न छूटा |
छूटा पाने की तनिक चाह नही ,
दुःख केवल यह जो बची उसपर
भी निबाह नही , बार बार निगाह
उस राह पर गई जिस राह पर सन्नाटा,
अंधेरा , न अपनी परछाईं ही , वापस
लौटकर खुद अपनी ही कभी चीखती कभी
खामोश आवाज मिली |
हर कोई यहाँ समझाता है मुझे कभी ,
किसी ने समझा नही | कभी सोचती हूँ
मौन ही हो जाऊँ समेट लूँ शोर अपना
अपने ही अंतर मे खो जाऊँ | मगर !
आसन नही बदलना मेरे लिए |
जब बदली हूँ बदल गई भावना मेरी ,
टूटे बंधन छूटे रिश्ते , मगर ! रहा सुकून मुझे |
बदलाव बुरा नही | चाहती हूँ बदलू बचे हिस्से
जिन्दगी के किस्से, मगर ! प्रयासों पर आदते भारी है,
कुछ भावना ने सहेज कर रखा है , कुछ हालात ने मेट कर
रखा है | बिखरी हूँ अनगिनत हिस्सों में मगर ! एक हिस्से मे भी मै नही | चाहती हूँ हर बार बदल जाऊँ अब मगर!
बदलना मेरे लिए आसान नही |